राजनीति में उभरी जातीय हिंसा समाज को कर रही तहस-नहस, आखिर कौन है इसका जिम्मेदार

आदिकाल से भारत में चली आ रही वर्ण व्यवस्था का सञ्चालन आज भी उसी तरह हो रहा है. आज भी समाज चार वर्णों में विभाजित है. अंतर सिर्फ आया है तो यह कि इन्हें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र न कह कर क्लास वन, टू, थ्री और क्लास फोर कहा गया है.

यानी आज भी उसी चार वर्ण में समाज का संचालन हो रहा है. अंतर मात्र यह आया है कि जो ब्राह्मण रहे होंगे, हो सकता है यहाँ उनकी स्थिति क्लास फोर की हो चुकी हो और जो शूद्र रहे होंगे, संभव है वे क्लास वन में हों. इसके लिए कई कारण रहे हैं. व्यवस्था के तहत शूद्र को ऊपर उठाने के लिए कुछ ख़ास व्यवस्थाएं बनायीं गयी थी. जिसमे उस समय के उच्च वर्णों की सोच और चिंतन शामिल था. लेकिन आज देश में जिस तरह से नव वर्ण में निहित जातियों को लेकर राजनीति की जा रही है वह बहुत निराश करने वाली है.

वर्ण के आधार पर समाज का विभाजन, जिसे अब जाति कहा जाता है वैदिक काल से ही मौजूद रहा है. इस व्यवस्था की शुरुआत व्यक्ति के पेशे की सम्माननीय पहचान के रूप में हुई थी. लेकिन मुगलकाल के बाद और ब्रिटिश शासन में जाति का इस्तेमाल ‘फूट डालो और राज करो’ के औजार के रूप में किया गया. भारत में जिस वर्ग को अनुसूचित जाति व जनजातियों के रूप में जाना जाता है उनके साथ भेदभाव, अन्याय और हिंसा का इतिहास बहुत लंबा है. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण और एससी-एसटी कानून जैसे कदम भेदभाव रोकने और समाज के हाशिये पर मौजूद इन तबकों को ऊपर लाने के लिए उठाए गए थे.

लेकिन देश की व्यवस्था संचालन के लिए सरकार बनाने के लिए होने वाले चुनाव जिस प्रकार से जातिगत आधार पर लड़े और जीते जा रहे हैं. उनके कारण देश का सामाजिक ढांचा ही चरमरा गया है. राजनीति में उभरी जातीय सत्ता ने समाज को तहस-नहस कर दिया है. यही वजह है कि देश में अब जाति की आग सुलग रही है. एक दूसरे के खिलाफ घृणा परोसी जा रही है. आखिर इन सबके पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही हैं ?

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